जानते है मदर टेरेसा के बारेमे

सेवा त्याग और समर्पण का प्रतीक mother Teresa को माना जाता है. मदर टेरेसा ने अपना पुरा जीवन दिन दुखियों की सेवा करणे मे व्यतीत किया. सामाजिक तीरस्कार से लढणे वाले लोगो के पीछे वह खंबीर तासे खडी रही. उन्हे सच्ची राह दिखलाइ. 26 अगस्त को mother Teresa का जन्मदिवस पुरे विश्व मे मनाया जा रहा है. जानते है उनके जीवन के बारे मे.

भारत आकर mother Teresa मी अपना पुरा जीवन सेवाकार्य मी व्यतीत किया. कोढ़ी, अपाहिज, वृद्ध और गरीब बच्चों के लिए मदर टेरेसा ईश्वर का प्रतिरूप बनी. जिन कोढ़ियों के शरीर से मवाद रिसता था, घावों पर मक्खियां भिनभिनाती थी, जो नित प्रति मृत्यु की अभिलाषा में जीवित थे मदर टेरेसा साधारण संसारी नहीं थीं. उन्होंने उन कोढ़ियों को न सिर्फ छुआ, बल्कि उनकी सेवा-सुश्रुषा भी की.

मदर टेरेसा का मुल नाम

नाम : अग्नेसे गोंकशी बोंजशियु।
जन्म : 26 अगस्त, 1910 युगोस्लाविया।
पिता : द्रना बोयाजु। (कॅथ्लिक)
माता : निकोला बोयाजु।
मृत्यु : 5 सितम्बर, 1997

मदर टेरेसा का प्रारंभिक जीवन

Mother Teresa का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ. उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे. जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया. उनकी सारी जिम्मेदारी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी. वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं. ऊनका बचपन कठीनाई से भरा था.

मदर को पसंद था पढाई और गाना

Mother Teresa बचपन से ही अध्ययनशील एवं परिश्रम करने वाली लडकी थी. उन्हे पढाई के साथ साथ गाना भी बहुत पसंद था. जब वह 12साल की थी तब उन्हे यह अनुभव हो गया था कि वह अपना पुरा जीवन मानव सेवामे व्यतीत करेंगी. इसीलिये उन्होने 18 वर्ष की उम्र में सिस्टर ऑफ लोरेटो मे शामिल होने का फैसला लिया.

सेवाकार्य से बनी मदर

Mother Teresa अपने सेवाकार्य से कुछ नही समय में प्रसिद्ध हो गई. 1928 में उन्होंने लोरेटो बहनों के साथ रहने के लिये घर छोड़ दिया था, वही मदर टेरेसा इंग्लिश भी सीखती थी और ईसाई धर्म प्रचारक बनने की राह में चल पड़ी. लोरेटो बहाने भारत में बच्चो को पढ़ाने के लिये इंग्लिश भाषा का उपयोग करते थे। घर से निकालने के बाद उन्होंने दोबारा कभी अपनी बहनों और अपनी माँ को नही देखा था. इसके बाद सन 1929 में मदर टेरेसा भारत आई और दार्जिलिंग में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की, वही हिमालय की पहाडियों के पास सेंट टेरेसा स्कूल में वे बंगाली सीखी और वहाँ बच्चो को पढ़ाती थी 24 मई 1931 को उन्हें पहली बार सन्यासिनी की पदवी मिली थी. इसके बाद उन्होंने अपना मूल नाम बदलकर टेरेसा ही रखा.

मदर का भगवान पर था विश्वास

Mother Teresa का भगवान पर बहुत विश्वास था. इसीलिए सेवाकार्य मे टूट गई थी. अपने पास संपत्ती ना होते हुए भी वह विश्वास और पूजा के साथ लोगो की मदत करती सेवा करती थी. गरीब लोगों की मदत करणे मे उन्हे खुशी मिलती थी निर्धन लोगों की देख-भाल के लिये सड़कों पर लंबी दूरी वो नंगे पैर चलकर तय करती थी.

भारत मे किया सेवाकार्य

Mother Teresa ने भारता कर सामाजिक पुरस्कार से लढते हुए लोगो को अपना लिया. उन्हे सच्चा प्यार दिया. कोढ़ी, अपाहिज, वृद्ध और गरीब बच्चों के लिए मदर टेरेसा ईश्वर का प्रतिरूप बनी.१९७० तक वे गरीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसे समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गॉड में इसका उल्लेख किया गया. इन्हें १९७९ में नोबेल शांति पुरस्कार और १९८० में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया.  

ढेर सारे पुरस्कार से मदर का सन्मान

Mother Teresa द्वारा किये गये सेवाकार्य को देखते हुए उनको विभिन्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1931 में उन्हें पोपजान तेइसवें का शांति पुरस्कार और धर्म की प्रगति के टेम्पेलटन फाउण्डेशन पुरस्कार प्रदान किय गया. अमेरिका के कैथोलिक विश्वविद्यालय ने उन्हे डोक्टोरेट की उपाधि से विभूषित किया. १९८८ में ब्रिटेन द्वारा ‘आईर ओफ द ब्रिटिश इम्पायर’ की उपाधि प्रदान की गयी. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि से विभूषित किया.

Mother Teresa शरीर रूप से आज हम लोगो के बीच नही है लेकिन अपने सेवाकार्य से व हमेशा जीवित रहेंगी. जब भी दुनिया में प्रेम और सेवा का नाम दिया जायेगा तब मदर टेरेसा को याद किया जायेगा.

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शिक्षा यानी education जो हमारे जीवन को संस्कारित करती है. हमारे जीवन को आकार देती है. प्रेरणा यानी motivation हमे हर परिस्थिती से लढणे का बल प्रदान करती है. Education and motivation ये दोनो शब्द हमारे जीवन में काफी महत्व रखते है. Education और motivation इस विषय को लेकर हिंदी मे ब्लॉग लिख रहा हू, जिसका नाम है worldtruthblog.

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